कह-मुकरियाँ  

खा गया पी गया
दे गया बुत्ता
क्यों सखी साजन !
ना सखी कुत्ता !

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जब वह मोरे मंदिर आए,
सोते मुझको आन जगाए ;
पढ़त फिरत वो बिराह के आच्छर
आए सखी साजन? ना सखी मच्छर!

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ऊंची अटारी पलंग बिछायो
मैं सोई मेरे सिर पर आयो
खुल गई अंखियां भयी आनंद।
ऐ सखी साजन? ना सखी, चांद!

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आप हिले और मोहे हिलाए
वा का हिलना मोए मन भाए
हिल हिल के वो हुआ निसंखा।
ऐ सखी साजन? ना सखी, पंखा!

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लिपट लिपट के वा के सोई
छाती से छाती लगा के रोई
दांत से दांत बजे तो ताड़ा।
ऐ सखी साजन? ना सखी, जाड़ा!

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वो आवै तो शादी होय
उस बिन दूजा और न कोय
मीठे लागें वा के बोल।
ऐ सखी साजन? ना सखी, ढोल!

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सगरी रैन छतियां पर राख
रूप रंग सब वा का चाख
भोर भई जब दिया उतार।
ऐ सखी साजन? ना सखी, हार!

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पड़ी थी मैं अचानक चढ़ आयो
जब उतरयो तो पसीनो आयो
सहम गई नहीं सकी पुकार।
ऐ सखी साजन? ना सखी, बुखार!

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सेज पड़ी मोरे आंखों आए
डाल सेज मोहे मजा दिखाए
किस से कहूं अब मजा में अपना।
ऐ सखी साजन? ना सखी, सपना!

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बखत बखत मोए वा की आस
रात दिना ऊ रहत मो पास
मेरे मन को सब करत है काम।
ऐ सखी साजन? ना सखी, राम!

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अमीर खुसरो का कविता
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1।    ह मुकरियाँ      

   
   गीत और कव्वालियाँ  
2।    
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाएके        
3।    
बहुत कठिन है डगर पनघट की           
4।    
तोरी सूरत के बलिहारी, निजाम         
5।    
अम्मा मेरे बाबा को भेजो री - कि सावन आया        
6।    
सकल बन फूल रही सरसों           
    
     
 कविता   
7।    
जब यार देखा नैन भर      

8।    पहेलियाँ                           

    
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गीत और कव्वालियाँ

बहुत कठिन है डगर पनघट की ।
कैसे मैं भर लाउं मधवा से मटकी ?
पनिया भरन को मैं जो गइ थी ।
दोड़ झपट मोरा मटकी पटकी ।
खुसरो निजाम के बल बल जाईय्ये ।
लाज रखो मोरे घुंघट पट की ।

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कविता

जब यार देखा नैन भर
जब यार देखा नैन भर दिल की गई चिंता उतर
ऐसा नहीं कोई अजब राखे उसे समझाए कर ।

जब आँख से ओझल भया, तड़पन लगा मेरा जिया
हक्का इलाही क्या किया, आँसू चले भर लाय कर ।

तू तो हमारा यार है, तुझ पर हमारा प्यार है
तुझ दोस्ती बिसियार है एक शब मिली तुम आय कर ।

जाना तलब तेरी करूँ दीगर तलब किसकी करूँ
तेरी जो चिंता दिल धरूँ, एक दिन मिलो तुम आय कर ।

मेरी जो मन तुम ने लिया, तुम उठा गम को दिया
तुमने मुझे ऐसा किया, जैसा पतंगा आग पर ।

खुसरो कहै बातों ग़ज़ब, दिल में न लावे कुछ अजब
कुदरत खुदा की है अजब, जब जिव दिया गुल लाय कर ।



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मिलनसागर
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गीत और कव्वालियाँ

छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाएके
प्रेम भटी का मधवा पिलाके मतवारी करलीनी रे
गोरी गोरी बय्यां हरी हरी चूरीयां
बय्यां पकड़ धरलीनी रे मोसे नैना मिलाएके
बल बल जाऊं मैं तोरे रंग रेजवा
अपनी सी करलीनी रे मो से नैना मिलाएके
खुसरो निजाम के बल बल जाईय्ये
मोहे सुहागन कीनी रे मो से नैना मिलाएके

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गीत और कव्वालियाँ

तोरी सूरत के बलिहारी, निजाम,
तोरी सूरत के बलिहारी ।
सब सखियन में चुनर मेरी मैली,
देख हसें नर नारी, निजाम...
अबके बहार चुनर मोरी रंग दे,
पिया रखले लाज हमारी, निजाम....
सदका बाबा गंज शकर का,
रख ले लाज हमारी, निजाम...
कुतब, फरीद मिल आए बराती,
खुसरो राजदुलारी, निजाम...
कौउ सास कोउ ननद से झगड़े,
हमको आस तिहारी, निजाम,
तोरी सूरत के बलिहारी, निजाम...

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*
गीत और कव्वालियाँ

अम्मा मेरे बाबा को भेजो री - कि सावन आया
बेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री - कि सावन आया
अम्मा मेरे भाई को भेजो री - कि सावन आया
बेटी  तेरा भाई तो बाला री - कि सावन आया
अम्मा मेरे मामू को भेजो री - कि साबन आया
बेटी तेरा मामु तो बांका री - कि सावन आया


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गीत और कव्वालियाँ

सकल बन (सघन बन) फूल रही सरसों,
सकल बन (सघन बन) फूल रही....
अम्बवा फूटे, टेसू फूले, कोयल बोले डार डार,
और गोरी करत शृंगार,
मलनियां गढवा ले आइं करसों,
सकल बन फूल रही...
तरह तरह के फूल खिलाए,
ले गढवा हातन में आए ।
निजामुदीन के दरवाजे पर,
आवन कह गए आशिक रंग,
और बीत गए बरसों ।
सकल बन फूल रही सरसों ।

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*
पहेलियाँ

बाला था जब मन को भाया
बड़ा हुआ कुछ काम न आया
सुसरो कह दिया उस का नाव
बूझे नहीं तो छोड़े गाँव
उत्तर - दिया

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एक गुनी ने यह गुन कीना
हरियल पिंजरे मे देदीना
देखो जादूदर का कमाल
डाले हरा निकाले लाल
उत्तर - तोता

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घूम घुमेला लहँगा पहिने,
एक पाँव से रहे खड़ी
आठ हात हैं उस नारी के,
सूरत उसकी लगे परी ।
सब कोई उसकी चाह करे है,
मुसलमान हिन्दू छत्री ।
खुसरो ने यह कही पहेली,
दिल में अपने सोच जरी ।
उत्तर - छतरी

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राजा प्यासा क्यों ?
गदहा उदासा क्यों ?
उत्तर - लोटा न था ।

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मिलनसागर