आकाश का पंछी
पंकज सैनी

देखता हूँ,
सोचता हूँ,
काश, मेरे भी होते दो पंख,
शायद ---
उनकी तरह उड़ पाता
तो कहता,
मै भी आकाश का पंछी हूँ।

उनकी तरह नभ छूना चाहता,
उनकी तरह ही उड़ना चाहता,
बेझिझक होकर ---
बेडर होकर ---
उड़ जाता,
तो कहता मैं आकाश का पंछी हूँ।

मस्त होकर, स्वतन्त्र होकर,
समुन्द्र जैसे आकाश मे,
बादलों के पास होकर,
हवाओ के साथ होकर,
उनकी तरह उड़ पाता,
तो कहता,
मै भी आकाश का पंछी हूँ।

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मिलनसागर
कवि पंकज सैनी का कविता
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बड़ते कदम
पंकज सैनी

आगे – आगे चलना चाहता हूँ,
पर राह में,
पत्थर, कांटे रास्ता रोक खड़े,
पर उनसे क्या घबराना,
जब मन में कोई मशाल हो।

जो सोचा,
उस लक्ष्य की ओर बढ़ा कदम
उसे पाना चाहता,
पर राह में,
दुविधाओं का बवंडर रास्ता रोके खड़े,
पर उनसे क्या घबराना,
जब मन में उस लक्ष्य का भूचाल हो।

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मिलनसागर
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सावन की सुगन्ध
पंकज सैनी

डाल डाल पर पड़ते झूले,
खुशी से हमारा दिल फूले,
नई सुगन्ध है लेकर आया,
यही है सावन की माया,

हर घर में गाते हैं गीत,
प्राचीन भारत की है रीत,
हर खुशियों को साथ में लाया,
यही है सावन की माया।

वरस में आता है एक बार,
इसमे आते है कई त्योहार,
बच्चों की मस्ती को लाया,
यही है सावन की माया।

जी करे कभी ना जाए,
ये मौसम ही बार बार आए,
पेड़ पौधो की हरियाली को लाया,
यही है सावन की माया।

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मिलनसागर
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वरसा कर दो
पंकज सैनी

हे बादल !
अब तो गड़-गड़ कर दो,
कालो शामियाने से ढक लो आकाश,
विद्युत आकाश में तुम जला दो,
.                        हे बादल !
.                        वरसा कर दो।


पोखर है सूखे,
धूल से घिरा गगन,
नूतन कोयल का कर दो विकास,
आज नहीं तो कब,
.                        हे बादल !
.                        वरसा कर दो।


तप रही है धरा,
अब तो ठण्डा कर दे
गर्मी से व्याकुल है जन,
राहत की श्वास दिला दे,
.                        हे बादल !
.                        वरसा कर दो।


जीव-जन्तू तो भागे फिर,
एक वन से दूसरे वन
खाली पोखर में डूब गए,
जल क्या पीए वो तो सूख गए
अब तो भर दो जल
.                        हे बादल !
.                        वरसा कर दो।


नदीया तो तड़प रही,
पानी की राह में,
मछलिया भी झड़प रही
पानी की राह में
वरसा की तलवार चला दो
.                        हे बादल !
.                        वरसा कर दो।

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मिलनसागर
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नया दिन
पंकज सैनी

हर दिन को नया दिन देखकर,
कार्य को कर दो पार,
आ जाए कुछ मुसीबत,
मत घबराओ,
फिर –
होगा नए दिन का आगाज।

तल्लीन होकर, क्रम लीन होकर,
जुट कर हो जाओ तैयार,
संयम को मन में बाघों,
आज नही हुआ तो क्या हुआ,
फिर –
होगा नए दिन का आगाज।

पीछे मत देखो क्या हुआ,
ये ना सोचो क्या हुआ,
हो जाओ तुम तैयार,
आज नही हुआ तो क्या हुआ,
फिर –
होगा नए दिन का आगाज।

आज भी नया दिन आया है,
हो जाओ तुम तैयार,
पीछो मुड़ कर मत देखो,
तुम –
करो नए दिन का आगाज।

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मिलनसागर
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मैं हूँ एक किसान
पंकज सैनी

उस मिट्टि को देखा,
उस मिट्टी में लेटा,
हूँ उस मिट्टी का इंसान,
मैं हूँ एक किसान।

हरी सूखी घास के साथ,
आशा लिए फसलों के साथ,
मेहनत करना मेरा काम,
मैं हूँ एक किसान।

निशा न देखी दिन न देखा,
सतत कार्य पाणी की रेखा,
सीधी – सादी है जुबान,
मैं हूँ एक किसान।

रुखी – सूखी मिले जो खाउ,
जैसा समय वैसा ही बिताउ,
हल चलाना ही मेरा काम।
मैं हूँ एक किसान।  

जग का भरण-पोशण मै करता,
वरसा बवंडर से न डरता,
सतत कार्य मे मेरा ध्यान,
मैं हूँ एक किसान।  

दिन-रात्री परिश्रम मै करूँ,
पसीना अपना खूब बहाउ,
लेता पहले श्री का नाम हूँ,
मैं हूँ एक किसान।  

जिस मिट्टी से सब बने,
मै भी –
हूँ उस मिट्टी का इंसान,
इसलिए –
मैं हूँ एक किसान।  

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मिलनसागर
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