कवि अतुल कुमार सिंह का कविता
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नूर-ए-रुखसार   

"उस चेहरे को क्या कहूँ में
जिसमें जहाँ का नूर समाया है
एक झलक पाकर जिसकी दिल ने
जन्नत का सुकून पाया है"

"कहूँ उसे अल्हड़पन जवानी का
या गुलाब कहूँ आबेहयात की रवानी का
कहूँ चंचलता का पैमाना उसे
या सागर नीले पानी का"

"सोचता हूँ वो चेहरा याद करके
जो बनकर धुंध जहाँ पर छाया है
फिर भी मैं उलझा हूँ साहिल
कोई ना उसे जान पाया है"

"दिल में है मेरे कशमकश यही
वो मेरा अपना या पराया है
उस चेहरे का नूर मगर
मेरे जीवन में आ समाया है"

"अक्स"
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अकेलापन    

"तन्हा अकेला निकल पड़ा हूँ मैं
वक्त नहीं मिला उसे साथ लाने का
सोचा उससे भी गले मिल लें
गम नाम है जिस परवाने का"

"मेरा साया भी मुझसे रूठा है
वक़्त नहीं मिलता उसे मनाने का
ज़माने की नहीं परवाह मुझको
जीवन नाम है इसी खोने पाने का"

"गले मिल खुशी से मैं खूब रोया
नहीं मिलता वक़्त उसे पाने का
बिछड उससे गम तो होगा मगर
गम भी इशारा है खुशी आने का"

"मैं सबसे मिला यूँ ही मगर
वक़्त न मिला ख़ुद को जान पाने का
जिसकी तलाश में निकला था तन्हा
वो साथ न मिला किसी दीवाने का"

"अक्स"
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मैं   

"आज मैं खुद को भूल गया
कौन हूँ, मैं क्या हूँ ?
कभी हूँ पत्थर दीवाने आम का
कभी साख से टूटा पत्ता हूँ"

"कोई कहता मयकश मैं हूँ
कोई मुझे साकी कहता है
किसी के लिए खिलौना हूँ मैं
जैसे चाहे मुझसे खेलता है"

"बेगानो की याद बाकी है
अपनो को भूल गया हूँ
खुद को खोजने की लत में
हर मंज़र से गुजर गया हूँ"

"आज मैं खुद को भूल गया हूँ
कौन हूँ, मैं क्या हूँ?"

"अक्स"
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एक प्रश्न  

"उसकी एक झलक को मैने
अपनी यादो को भी खोद डाला
पर ना मिला एक निशान भी
उसका जो मैने था बहुत संभाला"

"वो माहताब सा चेहरा
जिसमे कशिश थी प्यारी सी
था आफताब का नूर वो
जाने कहाँ छुप गया"

"खोजता हूँ उसे पल-पल
ख्वाबो ओर ख्यालो में
दिखता चाँद में साया वो
जाने क्यों मुझसे रूठ गया"

"बन पागल दर-दर भटका मैं
उसकी जन्नत ना पा सका
शबनम शोला लगती है मुझको
साहिल क्या मुझे प्यार हो गया"

"अक्स"
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तस्वीर   

"ख्वाबो ख्यालो में एक तस्वीर सजी है
क्यूँ मगर अधूरी सी लगती है
है कशमकश रंग कौन सा दूँ उसको
बने वो जो ना अभी तक बनी है"

"कल्पना के शिखर पर बैठा मैं
इसी उधेड़बुन में लगा हूँ
क्यों इस तस्वीर को सजाने में
हर जद्दोजहद से अड़ा हूँ मैं"

"प्यार का रंग गहरा बहुत है
भरते हुए डरता हूँ मैं
एक अजनबी तस्वीर में क्यों
प्यार का रंग भरता हूँ मैं"

"फिर भी प्यार का रंग दूँगा मैं उसे
कुदरत रत एक नज़ारे में जान होगी
ना बन सके शायद मेरी तबस्सुम वो
मगर किसी की वो जाँनिसार होगी"

"अक्स"
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बसंत   

"गरज रहे हैं बादल गर-गर
रिमझिम पानी बरस रहा है
हर कोई हर्षित हो देखो
इधर उधर को भाग रहा है"

"पेड़ो पर पड़ रहे हैं झूले
बसंत राग भी गूँज रहा है
सुनकर खग मृग का कलरव
मन हर्षित हो झूम रहा है"

"देख बसंत की रिमझिम बेला
कलियों का भी मन हर्षाया
पंख फैला कर किया स्वागत
फिर सावन का गीत सुनाया"

"अक्स"

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कोई मेरा अपना   

"इस तन्हा अकेले जहाँ में
ढूंढता हूँ एक साथी ऐसा कोई
जो साथ दे हर कदम पर मेरा
कह सकूँ मन में हो जो बात आई"

"कर सकूं गीले सीकवे जिससे मैं
बने जो मेरे जीवन की इक इकाई
हो जो मेरा निगहबान हर कदम पर
लगे काल सागर में मिली हो पतवार कोई"

"नहीं मिलता मगर मुझे ऐसा कोई
यूँ ही ज़िंदगी बर्बाद कर रहा हूँ
है आस दिल में मिलेगा मुझको वो
मैं जिसकी तलाश में भटक रहा हूँ"

"अक्स"
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धूमिल सत्य   

"ये जीवन वास्तव में क्या है
एक सफेद धुएँ का गुबार
या गुबार में भरा नीर
दोनो सूरतो में जीवन
हाथ से फिसलता है"

"अगर ये धुएँ का गुबार है
तो वायु के घने थपेड़े
इसका रंग-रूप ,चाल-ढाल
मिटाने में पूर्ण सक्षम है"

"अगर ये गुबार में नीर है
तब वायु का एक हल्का झोंका
इसे पाठ विचलित कर पाने में
धूल धूसित कर पाने में सक्षम है"

"ये प्रश्न मेरे अंतर्मन को
लगातार कचोट रहा है
कैसे जानूँ जीवन की सत्यता
जब जीवन के नाम पर समाज में
एक अंधविश्वास पल रहा है"

"अक्स"
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अंततः   

"घनघोर घटाएँ उमड़ पड़ी हैं
फैला प्रलय चारो ओर
झुकने लगा है गगन जमीं पर
नदियों में भी लगी है होड़"

"भूमंडल पर फैला पानी
लाँघ चुका है सब बाधाएँ
प्रकृति का तांडव देख कर
मानवता कर रही हाय हाय"

"उजाड़ चुके हैं नगर सारे
हो प्राचीन या वर्तमान
खो गयी हैं किलकारी नन्हो की
बड़े हुए बेसुध बेजान"

"तहस नहस कर गया सभी कुछ
किया जो प्रकृति से खिलवाड़
मानो कह रही हो हमसे
बंद करो ये अत्याचार"

"जब टूटेगा बाँध सब्र का
होगा ऐसा नर संहार
अब तो संभल जा हे मानव
प्रकृति कर रही पुकार"

"अक्स"
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कोई अपना   

"मैं आज खुश हूँ
नहीं जानता पर क्यूँ हूँ
शायद कोई अपना मिला है
जो बनकर एक फूल खिला है"

"मेरी खुशी का नहीं पारवार कोई
किसी को नहीं इससे सरोकार कोई
अपनी खुशी में मैं अकेला हूँ
तड़प गमो की भी मैं झेला हूँ"

"अंजानी खुशी मुझे जिया गयी है
बनकर धड़कन दिल में समा गयी है
यादों में रहती है हर पल
हर लम्हे को संजीदा बना गयी है"

"दिलो दिमाग़ पर छा गयी है
ये धुन्ध ना अब तक छँट पाई है
दिल में शंका है मगर अभी तक
ये क्या खुशी मैने पाई है"

"अक्स"
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सार   

"दुनिया में फैला अंधेरा
मेरे जीवन में सिमट रहा है
हर पल हर पहलू मेरा
धुँधला सा पड़ रहा है"

"उजाला ढूँढने की खातिर
जुगनू से लड़ रहा मैं
रोशनी के ख्वाब देखता
अंधेरो का आदी हो रहा हूँ"

"जाने किस कोने में छिपा उजाला
आँसू बहा रहा है
अंधेरा सीना तान खड़ा
ठहाके लगा रहा है"

"जज़्ब हो रहा अंधेरा मुझमें
हर पल मुझको निगल रहा है
उजाला दूर खड़ा एक कोने में
शर्म से गल रहा है,शर्म से गल रहा है"

"अक्स"
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