तुम्हारी संवेदना

कहाँ खो गई हूँ मैं
तलाश कर रही हूँ खुद को

 लोगों के दिलों से निकलकर
 जाने कहाँ दफन हूँ मैं

निकाल लो मुझे इस
अंधेरे से बाहर

  यहाँ मुझे कुछ दिखता नहीं
  सभी के मन मैले हो गये हैं

और जिस्म पर धुंध बिछी है
उजाला आये भी तो कैसे

  मन का अंधेरा आगे खड़ा है
  कभी इन्हीं के दिलों में बसती थी मैं

हर दिल में था मेरा बसेरा
इस दुनिया में एक अस्तित्व था मेरा

  अब गुम हो चुकी हूँ मैं
  ढूँढ़ लाओ मुझे

क्योंकि मैं हूँ
तुम्हारी संवेदना                        

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लक्ष्मी पाल का कविता
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