ऋतुपर्णो घोष का फ़िल्मी करियर और निजी जीवन - पन्ना के उपर में . . .
पिता सुनील घोष फिल्मी दुनिया का आदमी होने के नाते, यह लगभग तय था कि ऋतुपर्णो
उस दिशा में ही आगे बढ़ेगा। इसके अलावा, "बांग्ला एखन" टीवी चैनल पर एक साक्षात्कार में,
उन्होंने कहा था कि फिल्म बनाना, 12-13 साल की उम्र में, कोलकाता में टीवी केंद्र खोलने के
बाद, सत्यजित राय की विभिन्न फिल्में एक-एक करके प्रदर्शित हुई थी। टीवी पर वह देखने के
बाद, उन्होंने फैसला किया कि वह एक फिल्म निर्माता ही बनेंगे।
उन्होंने हिमांशु पारीजा द्वारा निर्देशित उड़िया फिल्म "कथा देइथिल्लि मा कू" में अपने अभिनय
करियर की शुरुआत की 2003 में। 2011 में, उन्होंने कौशिक गंगोपाध्याय की "आर एकटि प्रेमेर
गल्पो" और संजय नाग की "मेमरीज इन मार्च" फिल्म में अभिनय किया। "एक और प्रेम कहानी"
उनके द्वारा लिखी गई थी। "मेमोरीज़ इन मार्च" फिल्म में वे पटकथा लेखक और गीतकार थे।
उनकी अंतिम रिलीज़ हुई फिल्म "चित्रांगदा" (2012) में उन्होंने एक ट्रांसजेंडर चरित्र की भूमिका
निभाई।
क्या ये तीन फिल्में आत्मकथात्मक थीं? इसके उपर चर्चा-बहस-विश्लेषण आदि ते चलता ही
रहेगा। इस धरती पर प्राचीन काल से, अनगिनत लोग ऐसा पैदा हुए हैं जिनके शरीर, पुरुषों के
रूप में हैं, मगर उन्हें अपना सारा जीवन एक महिला की पुरुष शरीर में बंदी के रूप में बिताना
पड़ता है। महिला होकर जन्म लेने वाले नारी शरीर में पुरुष बंदी, ऐसे लोगों की संख्या भी कम
नहीं है। उन लोगों का सारा जीवन असहाय, आहें भरके बीताना पड़ता है समाज के उपहास
बरदाश्त करते हुए। अपने के दिल की बात करते हुए, ऋतुपर्णो घोष उन लोगों की बात समाज
के सामने मजबूती से रखा, आधुनिक समय में सबसे शक्तिशाली मीडिया में से एक - फिल्मों के
माध्यम से। यदि कवि, श्री रामकृष्ण परमहंस का सवाल "मनुष्य का कर्तव्य क्या है?" के
बंकिमचंद्र के जवाब "आहार, निद्रा मैथून" @ तक ही सीमित कर लिया होता, तो हमें कुछ बोलने
का अधिकार बनता। लेकिन हम देखते हैं कि ऋतुपर्णो, अपनी उत्कृष्ट प्रतिभा के प्रभाव से, प्रेम
की सीढ़ी पर उसे पीछे छोड़कर बहुत ऊपर पहुँच गए थे, जो उनके वैष्णव छंदों में स्पष्ट है। वहाँ
हम देखते हैं, उनके उच्च कोटी के भक्त की तरह, राधा-मार्ग पर चलते हुए शुद्ध प्रेम और श्रीकृष्ण
को पूर्ण समर्पण।
@ - "उद्बोधन" कार्यालय से 1421 बंगाब्द (2014) में प्रकाशित "श्री म कथित श्रीश्री रामकृष्ण-
कथामृत", दूसरा खंड, 1118-पृष्ठ, 1884, 6 दिसंबर।
ऋतुपर्णो घोष के फिल्म निर्देशन - पन्ना के उपर में . . .
ऋतुपर्णो घोष ने अपनी फिल्मों के निर्देशन के लिए ख्याति प्राप्त की। उस बारे में जानकारी और
चर्चा इंटरनेट पर सैकड़ों वेबसाइट, ब्लॉग और सोशल मीडिया में है। इसलिए उनकी फिल्मों की
चर्चा हम मिलनसागर के इस पृष्ठ पर विस्तृत नहीं करेंगे। हम केवल उनके फिल्मों का उल्लेख
करते हैं।
निर्देशक के रूप में उनकी पहली फिल्म 1992 में "हीरेर आंगटि" (बंगला) थी। बंगला फिल्मों में
इसके बाद "उनिशे एप्रिल" (1994), "दहन" (1997), बाड़ीवाली (1999), "असुख" (1999),
"उत्सव" (2000), तितलि (2002), अगाथा क्रिस्टी की “द मिरर क्रयाक्ड फ्रॉम साइड टु साइड”
पर "शुभ मुहुरत" (2003), "अंतरमहल" (2005,), दोसर (2006), "खेला" (2006), "सब चरित्र
काल्पनिक" (2006), आबहमान (2009), नौकाडुबी (2010)। उनके अंतिम रिलीज़ हुई फिल्म
"चित्रांगदा" (2012) है। अपनी आखिरी फिल्म "सत्यान्वेषी" (2013) की शूटिंग के दौरान उनका
अचानक निधन हो गया।
इसके अलावा उन्होंने गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की आत्मकथा पर आधारित वृत्तचित्र "जीवन्स्मृति"
(2012) भी बनाई।
उनकी अन्य भाषा की फिल्मों में हिंदी फिल्म “रेनकोट” (निर्देशन और गीतकार, 2004) और
"सनग्लास" (2012) जो रिलीज़ नहीं हुई थी। अंग्रेजी फिल्मों में "द लास्ट लियर" (2006) और
"मेमोरीज इन मार्च" (पटकथा लेखक और गीतकार, 2010)।
ऋतुपर्णो घोष को मिले फिल्म पुरस्कारों की सूची लंबी है। उनकी लगभग सभी फिल्मों के लिए
उन्हें कुछ न कुछ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। नमिनेशन व्यतीत उनके पुरस्कृत फिल्मों की
एक सूची हम यहां दे रहे हैं।
ऋतुपर्णो घोष का टीवी शो और पत्रिका संपादन - पन्ना के उपर में . . .
वह कम उम्र से ही कोलकाता दूरदर्शन से जुड़े रहे थे। उस समय कोई अन्य चैनल शुरू नहीं
हुआ था। ऋतुपर्णो घोष दो सेलिब्रिटी चैट शो आयोजित करते थे। पहला है ईटीवी बांगला
की "एवं ऋतुपर्णो" और दूसरा स्टार जलसा की "घोष एंड कंपनी"। वह आनंदबाजार ग्रुप से
प्रकाशित, 1996 से 2004 तक बंगला फिल्म पत्रिका "आनंदलोक" का संपादन किया।
ऋतुपर्णो घोष की कविताएँ और वैष्णव पदावली - पन्ना के उपर में . . .
कविता में उनकी सहज विचरण थी। हमें लगता है कि, अगर वे फिल्म निर्देशक नहीं बनकर एक
कवि बनते, तो बेशक वह एक कवि के रूप में उतना ही सम्मान मिलता, जितना कि उन्हे एक
फिल्म निर्देशक के रूप में मिला था। वह रोजमर्रा के जीवन में, कार्यस्थल में गीतकार के रूप में,
और बहुत ही व्यक्तिगत और शायद आध्यात्मिक स्तर पर भी कविता लिखते थे। एक भावनात्मक
बंगाली की तरह उन्होंने भी अपनी कविताओं की रचना करते थे।
हालांकि वह असंख्य फिल्मों में नहीं, बल्कि कई फिल्मों के लिए, गीत लिखा। बंगला, हिंदी और
अंग्रेजी फिल्मों के लिए उन्होंने जो गीत लिखे, उन्हें काफी लोकप्रियता मिली। हमने ऐसे कुछ गीत
और कविता मिलनसागर के इस पन्नों में कृतज्ञता के साथ दिए हैं।
मूल रूप से, उन्होंने बंगला और हिंदी में गीतों की रचना की, जिसे हम मिलनसागर में सर्वप्रथम
"कविता" मानते हैं। हिंदी गीतों की रचना करते हुए, उन्होंने वैष्णव पदावली की रचना की, जिनमें
ब्रजबुलि में लिखा हुआ दो वैष्णव पद भी है। उनके छंद केवल काव्य विशेषताओं के संदर्भ में
वैष्णव पदावली नहीं हैं, बल्कि श्रीचैतन्य महाप्रभू के बाद के गौड़ीय वैष्णव भावनाओं का विचार
धारा इसमें पूरी तरह से मौजूद है। "राधा-मार्ग" में भगवान श्रीकृष्ण के पास, भक्त-प्रेमी का समर्पण,
उनके लेख में बहुत सुंदर तरीके से परिलक्षित होता है।
यह श्रेष्ठ, भक्त की प्रेम-भक्ति भावना, उसकी निजी जीवन में पुरुष और महिला सत्ता या हस्ती के
बीच का तनाव में महिला की जीत के रूप में देखा जा सकता है।
हमने मिलनसागर के वैष्णव छंदों की सूची में कवि ऋतुपर्णो घोष के इस पन्ना को भी रखा है।
"भानूसिंह" और "भानु" भणिता के गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर के मुग्ध-अनुसारी ऋतुपर्णो घोष ने
उनकी पदों में कोई भणिता नहीं दिया। वैष्णव पदों की पाठकों का यह दुःख अब कभी न मिटने
वाला है कि, अगर ऋतुपर्णो अपने पदों में भणिता देते तो वह क्या होता!
कवि ऋतुपर्णो घोष ने हिंदी और ब्रजबुलि में कविताएँ लिखकर गर्व का स्थान अधिकार किया है,
हम ऐसा सोचते हैं। हमें उनके ब्रजबुलि में लिखे दो ही पद मिले हैं। हमारे हाथ में, हिंदी में
उनका वैष्णव पदों की संख्या 2 है।
कवि ऋतुपर्णो घोष - का जन्म कलकत्ता में हुआ। उनके पिता सुनील घोष थे वृत्तचित्र या
डॉकुमेण्टरी फिल्म निर्माता एवं चित्रकार। उनकी माँ भी चित्रकार थी।
उन्होंने अपना स्कूल-जीवन कलकत्ता के साउथ पॉइंट हाई स्कूल में बिताया। वह यादवपुर विश्व-
विद्यालय से अर्थशास्त्र में डिग्रीप्राप्त थे।
विज्ञापन की दुनिया में उनका करियर शुरू हुआ। वे एक एड-कॉपीराइटर थे। अस्सी के दशक
में उन्होंने बंगला विज्ञापन की दुनिया में कई लोकप्रिय एक पंक्ति के नारे लिखे। बंगला भाषा में
Boroline के एक बहुत लोकप्रिय नारा "বঙ্গ জীবনের অঙ্গ" उनकी ही रचना थी।