ये भूकंप तबाही और राजनीती
कवि आलोक सिंह कुशवाहा

जब-जब तबाही के  बादल आये
नेताओ ने अपने हमदर्दी दिखाये
धर्म की आङ मे,नफरत की झाङ लगाये
जो बटे उन्हे कट्टर वादी बतलाये।
मन्दिर गिरे, मस्जिद गिरे
मै पुँछू इसांन से गिरा कौन?
जब जान पे आयी चेहरे एक थे
बचे तो राम-रहीम हो गये।
मुवावजा भी पेश हुआ नीलामी का
मदद की नही उनकी गुलामी का
क्या कह और कर पाते हम??  
हमारी जमीर ही जरूरतो से बँधी रही।
हमारी सांसे टुट रही है
आप अपनी आंखे खोल के तो देखो
प्रकृति हमसे रुष्ट है
आपसी लङायी भुला के तो देखो।
सासें मेहमान है चंद पलो के
आपसी दीवार जोङ के तो देखो
हसीन होगें लम्हे सारे
एक दुसरे का हाथ थाम के तो देखो।
मत बाँटो राजनीती की चाह मे हमे
लहू एक,सासें एक, राहे एक
तुम भी इसांन बनो साथ दो
ना अधेंरा दो दिन का उजाला दो हमे ।
                   

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मिलनसागर
कवि आलोक सिंह कुशवाहा का कविता
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नसीब
कवि आलोक सिंह कुशवाहा

जिदंगी की जद्दोजहद मे हमने खुशी की लकीर
रेत पे बनाये,
पल भर की वेदना और लहरो व्दारा मिटा
दिये गये।
उन नसीब वालो का क्या रेशम की कमीज
थी लाखो की दीवारे थी,
हमारा अपना खुला आसमान था अनगिनत
व्दारे थी।
जितनी देर सम्भल सके सम्भल के चले,
क्या-क्या सपने लेके दौङे आखिरी मे गिरा
दिये गये।
सामने पङी रेत हवा ने उछाल आँखो मे झोक
दिया,
कपोल भींग गयें गला सूख गया।
छोटी तलैया जो सवेरा होने पे रंग बदलती,
अमावस की रात आज लहू संग चमक गयी।
चमक रही थी ज्योती उस अमीरजादे की
अम्बर मे,
हम विलीन हो गये सपनो के साथ समन्दर मे।
मेहनत ने ना रंग लाया ना सपनो ने पंख लगाये,
हकीकत पैसा था हम तो बस अभासी बन जान
गवाये।

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मिलनसागर
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औरत
कवि आलोक सिंह कुशवाहा

कभी बोतल का शराब कहा
कभी आदत का खराब कहा

बना कभी समा का हसीना
जिदंगी इन दरिदों ने छीना

दिल मे हसरत हजार
जाने ना दिया आँगन पार

कभी रावन ने हरण किया
आज दहेज ने दहन किया

गलती नही कोई सजा कैसा
बधाई आज ना दो हमे
हम जानते है तुम्हारा समाज कैसा

पढी है हमने इतिहास इन पुरूषो के
इति मे हम हास बन कर रह गये!!

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मिलनसागर
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