आलोक सिंह कुशवाहा का शायरी
1- माना मसहूर नही है हम आज इस मैखाने मे
मगर उन मासूम आँखो ने कोई कसर ना छोङा बदनाम कराने मे।
2- ना तुमने बताया ना हम बता सके,
बँया हुआ इश्क आँखो से हम ना छुपा सके।
3- एक झुठी खबर फैला दो बाजारो में
पैसे से नही दिल से इश्क होता है।
4- पढ के देख लिये मैने किताबे सारे
बेवफा को वफा सिखाने का हुनर ना मिला।
5- शराब/शबाब
रात मे जो तेरी यादो मे आँखे नम थी,
पैग मे दारू कम होने पे वो बरस रही है।
6- आज मुस्कान की कीमत इतनी बङी हो गयी!
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उस लङकी को देख मुस्करा दिया मुहल्ले मे दुश्मनी खङी हो गयी।
7- उस बेवफा का दिल ना फिसला सिर्फ,
पैर फिसल गये बहुतो के इस बेमौसम बरसात मे।
8- असर कैसा बेवफाई का..आलोक
सावन मे पतझङ नजर आ रहा है।
9- जितने चर्चे मेरी मुहब्बत के है ..आलोक
उतने तेरे बेवफाई के नही।
10- मेरी खामोसी को कमजोरी ना समझ ऐ काफिर।
गुमनाम समन्दर ही खौफ लाता है।
11- दिन और रात एक सी होने लगी है।
प्यार का अन्धा देखे तो क्या देखे।
12- वो मेरे ना हो सके
हम किसी के ना हो सके।
13- जाते वक्त उस लङकी ने कहा हजारो मिलेँगे मुझे।
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मैने कहा तुम हजारो के लायक हो सकती हो हमारे लायक नही।
14- चँद पलो के लिये अपना बनाया था तुमने।
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लगा हमे जिदंगी उन चँद पलो की ही मेहरबानी है।
15- गम तुम तो बङा बफादार निकले।
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बिना चाहत के ही हमारे बन गये।
16- तेरे चेहरे पे कोई जादु है।
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वरना
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इस गम के फरिश्ते को हँसता ना देखता कोई।
17- मौत एक मौका और दे मुझे उसे अजमाने का..
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इस बार शायद गले लगा ले वो मुझे तुझसे पहले।
18- मोहब्बत ही जँजीर थी वरना,
तुझे जिन्दा ना छोङता ऐसा गुल खिलाने को।
19- तुझे भुल जाने की कोशिशे तो लाख की थी मैने।
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मगर नाकामयाबी तो बचपन से कदम चूमती है मेरी।
20- तु दे दे सजा मुझे।
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तुझसे मोहब्बत करने की गलती की थी मैने।।
21- शायर हूँ मै कायर नही।
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जो दम मेरे कलम मे है वो तेरे तलवार मे नही।
22- तु वो नही कोई और है।
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वो मुझे रुलाने का शौकीन नही थी।
23-जितनी सिध्दत से चाहा था तुझे।
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आज उतना ही बरबाद हुँ।।
24- जीना मेरा, मरना तेरा बात एक ही
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दिल मे धङकन हम दोनो मे नही।
25- गली से गुजरा जो तेरी...
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अपनी बेवसी पे हँसी आ गयी।
26- चाहत को शराफत से पाने की चाहत मे
आज हाजिरी लगाता फिरता हू थाने मे।
27- तुझे भूल के आसानी से
सोचता हूँ हैरानी से
कितना मुश्किल काम किया आसानी से।
28- मेरे तारीफ को जिसने तफरी कह दिया
वो वेवफा हो गयीं तो, क्या गजब हो गया?
29- सफेद कागज पर बनायी थी तस्वीर उनकी
दिल वाला हिस्सा आज भी काला ही नजर आया।
30- हम ही अन्जान बन निकले, कानपुर!!
तेरे बेजान गलियारो का क्या दोष।
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मिलनसागर
कवि आलोक सिंह कुशवाहा का कविता
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कवि आलोक सिंह कुशवाहा का परिचिति . . .