कवियत्री मीराबाई का भजन
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कोई कहियो रे प्रभु आवन की
कवियत्री मीरा बाई
कोई कहियो रे प्रभु आवन की।
आवन की मन भावन की ।।
आप ने आवै लिख नहीं भेजे।
वाण पड़ी ललचावन की ।।
ये दोऊ नैन कह्यो नहिं मानै।
नदिया बहै जैसे सावन की ।।
कहा करूं कछु नहीं बस मेरो।
पांख नहीं उड़ जावन की ।।
‘मीरा’ कहे प्रभु कब रे मिलोगे।
चेरी भई हूं तेरे दांवन की ।।
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मिलनसागर
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प्यारे दरशन दीज्यो आय
कवियत्री मीरा बाई
प्यारे दरशन दीज्यो आय।
तुम बिन रह्यो न जाय ।।
जल बिन कमल चन्द्र बिन रजनी,
ऐसो तुम देख्यां बिन सजनी।
आकुल व्याकुल फिरूं रैन दिन,
बिरह कलेजो खाय ।।
दिवस भूख नींद नहीम रैना,
मुख सूं कथत न आवै बैना।
कहां कहूं कछु कहत न आवै,
मिलकर तपत बुझाय ।।
क्यूं तरसावो अन्तरयामी,
आय मिलो कृपा कर स्वामी।
‘मीरा’ दासी जनम-जनम की,
पड़ी तुम्हारे पांय ।।
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मिलनसागर
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आली री मेरे नैणा बाण पड़ी
कवियत्री मीरा बाई
आली री मेरे नैणा बाण पड़ी ।।
चित चड़ी मेरे माधुरी मूरत
उर बिच आन पड़ी।
कब की ठाड़ी पन्थ निहारूं,
अपने भवन खड़ी ।।
आली री मेरे नैणा बाण पड़ी ।।
कैसे प्राण पिया बिन राखूं
जीवन मूर जड़ी।
‘मीरा’ गिरधर हात बिकानी,
लोग कहे बिगड़ी ।।
आली री मेरे नैणा बाण पड़ी ।।
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मिलनसागर
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करमगति टारे नाहीं टरे
कवियत्री मीरा बाई
करमगति टारे नाहीं टरे ।।
सत्यवादी हरिशचन्द्र से राजा
नीच घर नीर भरे।
पांच पांडु और सती द्रौपदी
हाड़ हिमालय गरे ।।
करमगति टारे नाहीं टरे ।।
जग्य कियो बलि लेण इन्द्रासण
सो पाताल घरे।
‘मीरा’ के प्रभु गिरधर नागर
विष से अमृत करे ।।
करमगति टारे नाहीं टरे ।।
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मिलनसागर
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होरी खेलत हैं गिरधारी
कवियत्री मीरा बाई
होरी खेलत हैं गिरधारी ।।
मुरली चंग बजत डफ न्यारो,
संग युवति ब्रज नारी ।।
होरी खेलत हैं गिरधारी ।।
चन्दन केसर छिरकत मोहन,
अपने हात बिहारी।
भरि-भरि मुठि लाला चहुं ओर,
देत सबन पै डारी ।।
होरी खेलत हैं गिरधारी ।।
छैल छबीले नवल कान्ह,
संग स्याम प्राण प्यारी।
गावत चार घमार राग तहं,
दै-दै कर कर तारी ।।
होरी खेलत हैं गिरधारी ।।
कागद खेलत रसिक सांवरो,
बाढ़यो रस ब्रज भारी।
‘मीरा’ के प्रभु गिरधर नागर,
मोहन लाल बिहारी ।।
होरी खेलत हैं गिरधारी ।।
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मिलनसागर
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जागो बंसीवारे
कवियत्री मीरा बाई
जागो बंसीवारे ललना,
जागो मोरे प्यारे ।।
रजनी बीती भोर भयो है,
घर-घर खुले किवारे।
गोपी दही मथत सुनियत है,
कंगना के झनकारे ।।
जागो बंसीवारे ललना,
जागो मोरे प्यारे ।।
उठो लाल जी भोर भयो है,
सुर नर ठारे द्वारे।
ग्वाल-बाल सब करे कुलाहल,
जय-जय सबद उचारे ।।
जागो बंसीवारे ललना,
जागो मोरे प्यारे ।।
माखन रोटी हाथ में लीनी,
गउअन के रखवारे।
‘मीरा’ के प्रभु गिरधर नागर,
सरण आय कूं तारे ।।
जागो बंसीवारे ललना,
जागो मोरे प्यारे ।।
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मिलनसागर
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अरे राणा पहले क्यों न बरजी
कवियत्री मीरा बाई
अरे राणा पहले क्यों न बरजी,
लागी गिरधरिया से प्रीत।
मार चाहे छांड़ राणा,
नहीं रहूं मैं बरजी।
सगुन साहिब सुमरतां रे,
मैं थांरे कोठे खटकी।
राणा जी भेज्या विष रा प्याला,
कर चरणामृत गटकी।
दीनबन्धु सांवरिया है रे,
जाणत है घट-घट की।
म्हारे हिरदा मांहि बसी है,
लटकन मोर मुकुट की।
‘मीरा’ के प्रभु गिरधर नागर,
मैं हूं नागर नट की।
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मिलनसागर
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गोबिन्द कबहुं मिले पिया मोरा
कवियत्री मीरा बाई
गोबिन्द कबहुं मिले पिया मोरा ।।
चरण-कंवल को हंस-हंस देखूं,
राखूं नैना नेरा।
निरखण कूं मोहिं चाव घणेरो,
कब देखूं मुख तेरा ।।
गोबिन्द कबहुं मिले पिया मोरा ।।
व्याकुल प्राण धरत नहीं धीरज,
मिलन तूं मीन सवेरा।
‘मीरा’ के प्रभु गिरधर नागर,
ताप तपन बहुतेरा ।।
गोबिन्द कबहुं मिले पिया मोरा ।।
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मिलनसागर
कवियत्री मीराबाई का परिचिति . . .
कवियत्री मीराबाई का परिचिति . . .
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