यादें
पिंकि पुरकायस्थ चंद्रानी

ए  चांद , आज तेरी चांदनी मेरी रेशमी जुल्फों  के साये में ,
खेलती हुई, कुछ कहती जा रही है ,कुछ यादों के तस्वीरें बनाती हुई,
कुछ सपनो के ताने बाने बुनती जा रही है।
तुझे याद है ना, वह सदियों पुरानी बातें,वह हसने-रोने के पल, वह मीठी सी फरियादें।
मेरा वह आधी- आधी रात तक जागते रहना ,
वह पहले प्यार का सन्देशा , धड़कन की हलचल।
तुझ से बाते करते रहना, कितनी बार मिन्नतें की थी मैंने तुझसे,
कितनी बार अर्ज़िया भेजी थी , की मेरे खुवाबो में रोज आने वाला ,
चाहे  जो भी हो, जहाँ भी  हो,हलके के उसके कानो में कह्देना ,
कोई पलके बिछाये बैठा है राहों में तेरे, कभी लगा तू मुझ पर हसता होगा,
कहता होगा , अरी पागल, कहानियों के दुनिया से बाहर निकल ,
कभी महसूस होता जैसे तूने मुझसे कहा  हो  ,
इश्क पर जोर नहीं हैं ये वह आतिश , जो जलाये ना जले और बुझाये ना बुझे।
फूलों की पंखुड़ियों से  लिपटी हुई , ओस के बूंदों की तरह ,
मेरे दिल के  हर एक तमन्नायों से लिपटा हुआ तू,
कई  बार मैंने कसम दी थी तुझे तेरी  चांदनी की,
कहा था , वह जो बादल की आड में छुपा हुआ मेरे दिल को चुराता जाता है,
वह कभी तो किसी बिराने में खड़ा, तन्हाई के किसी एक अनजाने पल में,
तुझे निहारता होगा, होले से कहना उसे,
दुनिया के किसी कोने में कोई ,
तेरे चाहत का दिया जलाये बैठा   है  ,
दुनिया की भीड़ में भी तनहा तनहा ,
इन्तेजार के घड़ियों को आंसुओं के मोतीओं  से भिगोता हुआ,
यों ही तड़पता तरसता जीता चला जा रहा है .....

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मिलनसागर
कवियत्री पिंकि पुरकायस्थ चंद्रानी का कविता
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तुम, मैं और खामौशी
पिंकि पुरकायस्थ चंद्रानी

तुम, मैं और खामौशी ,
एक अजीब सा रिश्ता है हम तीनों के वीच।
कभी तुम यादों में आते हो ,
तो कभी ख्वाबों में।
कभी बादल बनकर घिर आते  हो ,मेरी अँखियों के आसमान में
तो कभी खुशी बनकर छा जाते हो, इन लवों की मुस्कान में।
तुम , मैं और खामौशी, एक अजीब सा रिश्ता है हम तीनों के वीच।
जब पास होते हो , तब ख़ामोशी से आँखों में आँखे डाल,जाने क्या क्या कह जाते हो।
और जब  दूर होते हो , तब भी मेरी  ख़ामोशी का हर एक पल  ,
अपनी यादों से महका जाते हो।
तुम , मैं और खामौशी, एक अजीब सा रिश्ता है हम तीनों के वीच।
ऑघि ऑघि रात को,  जाग उठती हूँ मैं, लगता है जैसे कानों मेरे ,
धीरे से कोई कुछ कह गया हो , एक अजीब सी हलचल होती हैं सीने में ,
सोचती हूँ कहीं ये मोहब्बत  तो नही ?
सूखे हुए पत्तों की मर्मराहट में  आजकल किसी का नाम सुनाई देता है।
मेरे रेशमी दुपट्टे को छुती हुई , सावन की वह बहकी हवा ,
लगता है जैसे चुपके से तुम अपनी मोहब्बत का ईकरार कर गए हो ।
या फिर सर्दी की धुप का  होले से , मेरे गालों को छु जाना ,
लगता है  जैसे की तुम अपने  दिल में छुपे हुए प्यार का ,एहसास दिला रहे हो.
तुम , मैं और खामौशी, एक अजीब सा रिश्ता है हम तीनों के वीच।
मेरे दिल के हर एक पन्ने पर , सिर्फ तुम्हारा नाम लिखा हुआ है ,
जरा अपनी धडकनों से , मेरे दिल के हर एक पन्ने  को पलट कर देखो तो नज़र आए।
पर हाँ , याद रखना जो कहना है आँखों से ही कहना ,
जो सुनना  है आँखों ही आँखों में ही सुन लेना ,दिल के बातें ख़ामोशी से हो , वही अच्छा है,
तुम , मैं और खामौशी, एक अजीब सा रिश्ता है हम तीनों के वीच।

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मिलनसागर
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तनहाई
पिंकि पुरकायस्थ चंद्रानी

आज शाम बड़ी तनहा तनहा सी  है,
यादों की चिल्मन फिर से छा रही है नजरों पर ।
तुम  दूर होकर भी पास थे कभी,
वस ध्यान रखना नजदीकिया भी बदल न जाएँ दूरियों में।
सालो बाद संदूक के किसी कोने में हिफाज़त  से रखा हुआ
तुम्हारा वह पहले प्यार का पहला ख़त,  
जैसे  मुझको  तुम्हारे सामने ले आया सदियों के बाद ।
बड़े तमन्नाओं से संजोकर रखा था उसे।
गुलाबी पन्ने पर  चाहत की  स्याही उड़ेल कर,
 लिखी गयी हर एक लफ्ज़ में  से ,
आज भी भीनी भीनी खुसबू   लिपटी हुई है जैसे।
कितनी चाहत छुपी हुई थी उन बातों में,
कितने वादे थे, कितनी कसमें थी ।
वह वादें  सायद हम निभाना न पायें,
इसका मतलब वह झूटे तो नही।
चाँद और कमल का  मिलना नामुमकिन सी बात बात है ,
पर  दोनों  अजनबी  नही।
आज भी चाँद कमल को रात रात भर ,
निहारता रहता है ,
आज भी कमल के दिल में कसक उठती है,
पाने की गुंजाईश न रखना , खोने का दूजा नाम तो नही।
मेरी हथेलिओं के लकीरों में सायद  तुम्हारा नाम लिखा हुआ न हो ,
पर वह तुमसे जुदा  होने का  फरमान तो नही।

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मिलनसागर
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