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शिक्षक कवियत्री डः सुकर्मा थरेजा
हो सकता है, कोई भी शिक्षक, माँ, पिता, भाई, बहन और मित्र | सरल बनाता विद्यार्थी जीवन को शिक्षक, जीवन की पूंजी विद्यार्थी में देखता शिक्षक, जात-पात, और अमीर-गरीब में भेद ना करे शिक्षक,
समाज की मूल ईकाई है शिक्षक, जोड़ने की बात हमेशा करे शिक्षक, राष्ट्र निर्माण में योग दान देता, ज्ञान की खान, गुणवान होता शिक्षक |
कक्षा में विद्यार्थी करें उसका भेजा फ्राई, सख्ती में जब वह करें, तो पीठ पीछे, करें उसकी ढेर बुराई, इन सभी को अनसुना करे शिक्षक, इन्सान को इन्सान बनाये शिक्षक |
अंगड़ाई ले रहा, आज नया युग, लेन देन नहीं, जिनका पढ़ाई से, ऐसे आ गए कई शिक्षक उनकी विद्या से कांपे ज्ञानी शिक्षक
शिक्षा व पैसे की घनिष्ट मित्रता, जाना विद्यार्थी का ट्यूशन मण्डी में, मजबूरी और फैशन है आजकल के युग में, प्रीरिक्वीजीट, हो गई है अच्छी कोचिंग इंजीयरिंग, मेडिकल कालेज के दाखिले में, कोचिंग के बिना, विद्यार्थी अधूरा है | विद्यादान व्यापार हो गया है अच्छे शिक्षण संस्थान में गरीब विद्यार्थी पढ़े, यह सपना अब अधूरा हो गया है गुरु-शिष्य का पवित्र रिश्ता, आज बहुत कमजोर हो गया है,
माना जीवन यापन के लिए धन बहुत जरुरी पर शिक्षक की ऐसी कौन सी मजबूरी जो विद्या के महादान में स्वच्छ तरीका अपनाने में असमर्थ है शिक्षक
जो बच्चों के सपनो के साथ खेलें, कैसे उन्हें दे दें, राष्ट्र निर्माता पद का उपहार, शिक्षा में राजनीति जिसकी व्यवस्था तो कैसे माने उसे सदगुण सरीखा |
हजारो अधूरी अभिलाषायें पूरी हों आज भी प्रत्यनशील-मुठ्टी पर शिक्षक, प्रयासों से जिनके, आज हम यहाँ पर, शिक्षक दिवस पर उन्हें, शत - शत प्रणाम |
गंगा की तरह बहो, मेरे शिक्षक, सभी के आदर्श बनो, मेरे शिक्षक, कोई विद्यार्थी पीछे ना छूटे, सभी विशिष्ट अभिन्न अंग हो, इस भारत के ऐसा वचन दो मेरे शिक्षक, ऐसा वचन निभाओ मेरे शिक्षक ||2
अदम्य साहस भरते, प्रथम चरण विद्या का रखने, चंचल निश्छल नौनिहाल, आते आई ० आई ० टी ० कानपुर - किसलय में, घर नुमा प्राथमिक विद्यालय ये उनका, नौनिहाल - की गूंज - किलकारियाँ है, आई ० आई ० टी ० कानपुर - किसलय ।
किसलय जीवन का प्रभात है, किसलय विद्या जीवन की नींव है, कोरा कागज सा यह बचपन, किसलय की अनूठी तस्वीर है, मूरत ममता की है किसलय, पहले कभी बसता टाइप – V, आई ० आई ० टी ० कानपुर में, आजकल बसता पडोस, आई ० आई ० टी ० कानपुर, के ० वी ० में । प्यार सी मुस्कान लिए, मुठ्टी में वरदान लिए, प्रेम रूप अस्मित, विलक्षण प्रतिभा है जिनकी, सुबोध बालक बालिकाए, उपस्थित रहते, आई ० आई ० टी ० कानपुर - किसलय में ।
तीव्र स्फूर्ति वा ऊर्जा जिनकी, बिजली जैसी दौड़ है उनकी, इसीलिए क्षमता सबल कार्य करने की, बनी रहती परिवार, आई ० आई ० टी ० कानपुर - किसलय में ।
किसलय है सरिता सरस्वती की, शिक्षक, कर्मचारी, स्टाफ एवं विद्यार्थी, संवारता सपने उमंगे सबकी, छूता सहर्ष सकारात्मक भावनांए सबकी, ऐसा प्रमाणिक विद्यालय है, आई ० आई ० टी ० कानपुर -किसलय ।
छोटी-छोटी नैतिक शिक्षा, माध्यम ड्रामा,लोक गीत - कविता, पूर्ण निष्ठा एवं विश्वास गुण से, झोली किसलय सबकी भरता ।
किसलय इस युग का प्रभात है, ईश्वर करे सौजन्य विनायक रहे, यह प्यारा आई ० आई ० टी ० कानपुर - किसलय, अखंड सहज शीलता भरे, विद्यार्थियों के ह्रदयों में, यह आई ० आई ० टी ० कानपुर - किसलय, ऐसा विश्वास एवं कामना लिए, गर्वित है, आई ० आई ० टी ० कानपुर, परिवार एवं शिक्षक।
प्रतिस्पर्धा, के जंतर मंतर से, बीज प्रतिस्पर्धा - प्रतिभा के जग में बिखेरते , प्रतिस्पर्धा जगत के तोफे सब को मिलते l
प्रतिस्पर्धा जगत अजनबी, अनजाना सा लगता है, परन्तु समय कठिन में, मित्र पुराना सा लगता है ।
कभी प्रतिभागियों का मेला, कभी भीड़ में भी प्रतिभागी अकेला, प्रबल एहसास कराता है, यह जगत अजूबा निराला ।
कभी घोर तन्हाइयों की, स्याही भयानक रातों में, परम दोस्त बन जाता, अव्यवस्था में व्यवस्था बनाकर, प्रतिभागियों को बहुत रिझाता ।
कभी पल - पल की अस्थिरता समझकर, कभी पल - पल का भरोसा देकर, सबको समझाता ठहराता, समय पर यथा संभव मदद देकर प्रतिभागियों का हम राज़ बन जाता ।
भाषा अपनी - अपनी में, अंदाज़ अपने - अपने में, प्रतिभागी छोटे - छोटे राज़ खोलते इस प्रतिस्पर्धा जगत में ।
छोटे बड़े गॉवो, कस्बों शहरो में, पाठशाला, विद्यालयो और महाविद्यालयों में, सरस्वती माँ के चरणों में, पवित्र ज्ञान की गंगा में, डुबकी लगाने आते अनेको प्रतिभागी, थिरकते शान से, बजाते ज्ञान की बांसुरी, और खो जाते प्रतिस्पर्धा जगत में ।
माना कभी हँसाता यह जगत, माना कभी रुलाता यह जगत, पर जब भी निराशा, प्रतिभागी के हाथ लगती, खड़ा हो तरह -चहान की , थामता हाथ यह जगत ।
इतनी भीड़, इतनी भागदौड़, कुछ प्रतिभागी तो गिर जाते, कुछ प्रतिभागी तो सम्भल जाते, सबको निजी सहारा दे, खड़ा करता सुसंस्कृत प्रतिस्पर्धा जगत ।
माना प्रत्येक प्रतिभागी का अनोखा कोई ना कोई सपना है । इस भागदौड़ में एक विचार ही, जो पल - पल साथ रहता, वह ही तो अपना है ।
प्रतिभागियों की लम्बी कतारें, आश्वासन दिलाती हैं, नतीजा चाहे कुछ भी हो, प्रतिस्पर्धा जगत तो, सदैव उनका अपना है ।।२
आखों में दर्द क़ा साथ लिए पूछती वह ? बदसलूकी का शिकार हमेशा मैं ही क्यों ? नसीब मेरा फूटा है क्यों ? माना जन्मदाता कर्ज़ को उठाने, धकेला बाल विवाह की तरफ अपनों ने, क्या करूँ माँ - बापू इन सुंदर गहनों को? क्या देगे यह अद्भुत कपड़े मुझको? जब मन अटका मेरा हम जोली, बीच खेलने - कूदने एवं पढ़ने को ।
हे! समाज के ठेकेदारों, बताओ तुम ही, किसको बताऊँ दास्ताँ बदनसीबी की, मायके वा ससुराल वालों को, कितना ठीक है, समाज में, वर से आधी उम्र की बहू लाना ? इस पर वह समझे अपने को गर्वित क्यों ? रखकर देखे ,वह अपनी बेटी को, मेरी जगह बेमेल विवाह में, तब कांपती उनकी atma आत्मा क्यों ? यह शराफत मेरी जो बन बहू, पर्दापण किया इस घर में ।
दूर कोसोमील, पल - पल ख़ुशी से मैं, सुबह सब उठते अपने - अपने काम करने को, मैं उठती सबकी तीमारदारी करने को, मैं तरसूँ सम्मान पूर्वक घर बसाने को ।
मुझ पर जब जोर जबरदस्ती से सभी राज़ करते , मेरा अन्तःकरण, बुरी तरह जल जाता , तब जानवर से बतर मै समझूं अपने को, क्योंकि बचपन मेरा तिल - तिल घट जाता ।
यह संवेदनहीन, पहचान मेरी, यह बोझिल मन वजूद मेरा, जब कभी भूले भटके आते, पैसेमायके से मेरी, पति देव छीन ले, वह लघु धन मेरा, बालिका वधू तो है, शोषण करने को, पर सब भावुक उपदेश देते दूसरों को, बहू - बेटियाँ में, अन्तर ना समझने को ---
माना दन - दन बंदूके चलाना --- माना धम - धम गोले बरसाना --- आतंकवाद ! दहशत गर्दी का तन्त्र तेरा --- क्यों दुश्मन पर तू --- आतंकवाद फैला रहा तू --- ढेर मानव देह के लगाये तूने --- सोच! वह भी इंसान है जैसे तेरे --- जिन्दगी जिनकी दाव पर लगाई तूने --- रहम कहाँ उनके मासूमों पर तुझे ? जैसे जु ड़ा पक्के धागों से अपनों के संग तू, वैसे दुश्मन भी जु ड़ा अपनों के संग अरमान भी है, उनके जैसे तेरे ---
माना आतंकवाद फैलाना, समझे धर्म अपना तू --- 'दुश्मन' की पवित्र राखी खत्म कर खुश होता तू --- किस हक से उजाड़े सुहाग -सिन्दूर बहनों के तू ? काश! जानता कीमत इन रिश्तों की तू।
माना सब दुश्मन - परिजन बेबस , देखे ओर तेरी --- पर बद् दुआ देते थकते नहीं तुझे --- दुश्मन - परिजनों के आहत मन ! सकते में है, यह भोली पृथ्वी माँ, नहीं जानता है, आतंकवादी तू, जिस दरिंदगी पर गर्व करे तू, उपर वाला करतूत देखकर तेरी, इस अव्यवस्थित कनायात में, मन ही मन सोच कितना परेशान है।।2